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भोजशाला में नमाज के बाद हुई पूजा (राउंडअप)

104 Days ago

विवाद वसंत पंचमी के शुक्रवार को पड़ने के कारण पैदा हुआ। परंपरा के अनुसार भोजशाला में वसंत पंचमी को पूजा और शुक्रवार को जुमे की नमाज होती है।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने दोनों धर्मो के अनुष्ठान संपन्न कराने की व्यवस्था बनाई थी। व्यवस्था के मुताबिक, सूर्योदय से दोपहर 12 बजे तक पूजा और अपराह्न् एक बजे से तीन बजे के बीच नमाज होनी थी। यहां हर मंगलवार और वसंत पंचमी के दिन पूजा होती है और शुक्रवार को जुमे की नमाज अता की जाती है।

लेकिन भोज उत्सव समिति और हिंदू जागरण मंच के लोग सूर्योदय से सूर्यास्त तक भोजशाला के अंदर हवन-पूजन के लिए अड़े हुए थे। दूसरी ओर प्रशासन एएसआई की व्यवस्था के क्रियान्वयन की पूरी तैयारी कर रखी थी।

प्रशासन के रवैए से नाराज भोज उत्सव समिति ने सुबह भोजशाला के बाहर मोतीबाग इलाके में हवन-पूजन का फैसला किया। हवन कुंड में जलती समिधा में श्रद्घालुओं ने आहूतियां दीं और हवन वेदी पर माला-पुष्प अर्पित किए।

सूत्रों के अनुसार, प्रशासन ने नमाज और पूजा की अपनी रणनीति तैयार कर रखी थी। सुबह कुछ लोगों को कुर्ता-पाजामा और महिलाओं को साड़ी पहनाकर भोजशाला के भीतर पूजा सामग्री के साथ भेज दिया गया था।

सूत्रों ने बताया कि इस बीच प्रशासन और सरकार की पहल पर भोज उत्सव समिति के कुछ लोग भी हवन-पूजन की सामग्री लेकर सुबह भोजशाला के भीतर पहुंचे। लेकिन समिति के सदस्य अचानक बाहर निकल आए।

समिति के अशोक जैन ने कहा, "भोजशाला के भीतर ऐसे लोग जमा हैं, जिनका इस आयोजन से लेना-देना नहीं है, लिहाजा अब वे बाहर ही पूजा करेंगे।" उसके बाद हिदू समाज के लोगों ने बाहर हवन पूजन किया।

जैन ने आरोप लगाया, "भोजशाला परिसर को छावनी में तब्दील कर दिया गया है, कई लोगों को हिंदुओं के पहनावे में खड़ा कर दिया गया है। हिंदू समाज के लोग भोजशाला पूजा करने जाते हैं युद्घ करने नहीं।"

बहरहाल, तय कार्यक्रम के अनुसार प्रशासन की ओर से अपराह्न् में नमाज के लिए चिन्हित मुस्लिमों को ले जाया गया। लगभग 25 मुस्लिम प्रतिनिधियों को भोजशाला की छत पर बने पंडाल में नमाज अता कराई गई।

नमाज के बाद सरकार के प्रवक्ता और धार जिले के प्रभारी मंत्री नरोत्तम मिश्रा व प्रशासनिक अमले ने भोज उत्सव समिति व हिंदू जागरण मंच के लोगों को भोजशाला के अंदर पूजा के लिए सहमत कर लिया। तब परिसर के अंदर भी पूजा-हवन हुआ।

शुक्रवार को बड़ी संख्या में लोग भोजशाला पहुंचे, मगर अधिकांश ने बाहर बने हवन कुंड में ही आहूति दी। संभवत: यह पहला मौका है, जब भोजशाला के बाहर पूजन-हवन हुआ।

समिति व हिंदू जागरण मंच ने दोपहर बाद लालबाग इलाके से शोभायात्रा निकाली, जो विभिन्न मार्गो से होते हुए भोजशाला पहुंची। जब हिंदू समाज के लोग बाहर जमा थे, उस समय प्रशासन भोजशाला की छत पर नमाज अता करा रहा था।

इस दौरान भोजशाला के आसपास और पूरे धार शहर में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए थे। पुलिस के लगभग छह हजार जवान तैनात किए गए थे। इसके अलावा ड्रोन और सीसीटीवी कैमरों से नजर रखी गई। अश्वारोही दल भी तैनात था। भोजशाला तक जाने के लिए बेरिकेटिंग की गई थी, जिससे लोग कतार में ही भीतर जा सकते थे।

इंदौर के संभागायुक्त संजय दुबे ने संवाददाताओं से कहा कि उनके लिए प्रसन्नता की बात है कि "राज्य सरकार द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन कराने में प्रशासन सफल रहा। दोनों संप्रदाय के लोगों ने शांतिपूर्वक पूजा की और नमाज अता की। यह सभी वगरें के सहयोग से संभव हो पाया है।"

प्रशासन ने वर्ष 2006 में अपनाए गए फार्मूले को एक बार फिर दोहराया है।

एएसआई के अनुसार, धार एक ऐतिहासिक नगरी है। यहां राजा भोज ने 1010 से 1055 ईस्वी तक शासन किया थाा। उन्होंने 1034 में धार नगर में सरस्वती सदन की स्थापना की थी। बाद में इसे भोजशाला के नाम से पहचान मिली। यहां सरस्वती (वाग्देवी) की प्रतिमा स्थापित की गई थी। इस प्रतिमा को 1880 में एक अंग्रेज अपने साथ लंदन उठा ले गया। वर्तमान में प्रतिमा लंदन में ही है।

एएसआई के अनुसार, भोजशाला को 1909 में संरक्षित स्मारक घोषित कर दिया गया, और बाद में इसे पुरातत्व विभाग के अधीन कर दिया गया।

ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, कुछ लोगों द्वारा भोजशाला को मस्जिद बताए जाने पर धार स्टेट ने ही 1935 में परिसर में शुक्रवार को जुमे की नमाज अता करने की अनुमति दे दी थी। तभी से यह व्यवस्था चली आ रही। कई बार विवाद बढ़ने पर कई वषरें के लिए नमाज और पूजा के कार्यक्रम बंद भी रहे। वर्ष 2003 से पूजा, नमाज का सिलसिला लगातार चला आ रहा है।

इस दौरान 2003, 2006 और 2013 में बसंत पंचमी शुक्रवार को पड़ी तो विवाद हुआ। 2003 में हिंसा भी हुई थी।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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